Sunday, March 6, 2022

पाठ्य सहगामी गतिविधियाँ: आशय, उद्देश्य एवं सिद्धांत

 पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ (CO CURRICULAR ACTIVITIES): उद्देश्य, महत्त्व एवं सिद्धांत


पाठ्य-सहगामी क्रियाओं से आशय उन क्रियाओं से है जो पाठ्यक्रम के साथ-साथ विद्यालय में करायी जाती हैं। इन क्रियाओं का उतना ही महत्व है, जितना कि कक्षा में पढ़ायी जाने वाली पाठ्य-वस्तु।


उद्देश्य-पाठ्य सहगामी क्रियाओं के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का सर्वप्रथम उद्देश्य छात्रों को प्रजातंत्र तथा नागरिकता की शिक्षा प्रदान करना है।

2. छात्रों का सर्वतोन्मुखी विकास करना।

3. छात्रों को स्वशासन की शिक्षा प्रदान करना।

4. समाज और विद्यालय के महज आपसी सम्बन्धों को सुदृढ़ करना।

5. छात्रों की रूचियों का सही मार्गदर्शन करना।

            शिक्षा में मनोविज्ञान के प्रवेश से पूर्व शिक्षा का उद्देश्य केवल मानसिक वृद्धि करना था। उस समय विद्यालयों में किताबी ज्ञान एवं शिक्षा प्रदान की जाती थी, लेकिन आप शिक्षा का उद्देश्य बालकों का केवल मानसिक विकास करना ही नहीं, बल्कि मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक विकास करना भी है।


महत्त्व 

अब विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शिक्षण के अलावा अन्य क्रियाओं को भी महत्त्व दिया जा रहा है। पाठ्य सहगामी क्रियाओं का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट है-

1. छात्रों में निहित प्रतिभाओं की खोज एवं विकास- पाठ्य-सहगामी क्रियाओं के माध्यम से छात्रों में निहित विभिन्न प्रतिभाओं की खोज कर उन्हें उजागर किया जा सकता है।

2. अतिरिक्त शक्तियों का समुचित उपयोग- छात्रों की अतिरिक्त शक्तियों का समुचित उपयोग, उनकी अतिरिक्त शक्तियों का समुचित उपयोग इन क्रियाओं द्वारा होता है।

3. शैक्षिक दृष्टि से महत्व- इनके माध्यम से छात्र परस्पर सहयोग, प्रेम, सद्भावना, मेल-मिलाप, सहकारिता आदि गुणों का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते है।

4. विशेष रूचियों का विकास– पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का वैविध्य छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करता है वे अपनी रूचियों के अनुसार उन्हें अपनाते हैं। इस तरह उन्हें अपनी रूचियों को तृप्त करने का अवसर प्राप्त होता है।

5. सामाजिक दृष्टि से महत्व- इनका सामाजिक दृष्टि से भी बड़ा महत्व है, प्रतिनिष्ठा और कर्त्तव्यपरायणता से ओत-प्रोत होकर छात्र विद्यालय और राष्ट्र से प्रेम करना सीख जाता है।

6. नैतिक दृष्टि से महत्व- इन क्रियाओं का नैतिक दृष्टि से भी महत्व है। छात्र वफादारी और नियमों का पालन करना सीख लेते हैं।


पाठ्य-सहगामी क्रियाओं के संगठन के सिद्धान्त

पाठ्य-सहगामी क्रियाओं के लाभों को उचित और प्रभावशाली ढंग से उठाने के लिए यह आवश्यक है कि उनका संचालन ठीक प्रकार से किया जाए। इनके प्रभावशाली और उचित संगठन के लिये निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है-

1. विद्यालय कार्य-काल में ही इनका संगठन हो— पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ विद्यालय के कार्य-काल में ही संगठित की जाए। इस प्रकार की व्यवस्था से सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि अधिक से अधिक छात्र इन क्रियाओं में भाग ले सकेंगे। विद्यालय बन्द हो जाने के पश्चात् दूर रहने वाले छात्रों का इनमें भाग लेना सम्भव नहीं होगा। ऐसी दशा में अनेक छात्र लाभान्वित होने से वंचित रह जायेंगे। अतः विद्यालय के समय में ही पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन किया जाए तो उत्तम है।

2. छात्रों का अधिक से अधिक सहयोग- इन क्रियाओं के संगठन में यथासम्भव छात्रों का अधिक से अधिक सहयोग प्राप्त किया जाय। प्रत्येक क्रिया के संगठन और संचालन में छात्रों से सलाह लेना उचित है और उन पर कुछ उत्तरदायित्व भी डाले जाएँ।

3. शिक्षा और विद्यालय के उद्देश्य का ध्यान– पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ केवल आनन्द प्रदान करने वाली न हों। वरन् इनका संगठन इस बात को ध्यान में रखकर किया जाए कि ये शिक्षा और विद्यालय के उद्देश्यों की अधिक से अधिक पूर्ति कर सकें।

4. उचित योजना का निर्माण-  विद्यालय में किसी भी पाठ्य-सामग्री क्रिया का संगठन इस बात का ध्यान में रखकर किया जाए कि ये शिक्षा और विद्यालय के उद्देश्यों की अधिक से अधिक पूर्ति कर सकें।

5. उचित चुनाव- इन क्रियाओं का उचित और उपयुक्त चुनाव ही इनके संगठन का महत्वपूर्ण पहलू है। इस विषय में निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है—


(क) क्रियाओं में वैविध्य और व्यापकता होनी चाहिए, जिससे प्रत्येक छात्र अपनी रूचि के अनुकूल रूचियों का चयन कर सकें।

(ख) क्रियाएँ आवश्यकता से अधिक भी न हों।

(ग) अधिक व्ययपूर्ण क्रियाओं को स्थान नहीं दिया जाए।

(घ) उन पाठ्य-सहगामी क्रियाओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाए जिनका शिक्षा सम्बन्धी अधिक महत्व हो।

(ङ) क्रियाएँ साध्य न होकर साधन हों।

(च) क्रियाओं के चयन में स्थानीय वातावरण का अवश्य ध्यान रखा जाए।

6. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं को अध्यापकों के कार्य का एक अंग माना जाए- अध्यापकों को इन क्रियाओं के विषय में यह ध्यान रखना कि ये भी पाठ्यक्रम का एक अंग हैं। अतः यदि उन पर इनका कार्य या उत्तरदायित्व सौंपा जाए, तो उसे वह शिक्षण का एक अंग मानकर स्वीकार करें। इनको उत्तरदायित्व का बोझ नहीं माना जाए। 

7. अध्यापक केवल मार्गदर्शन करें- जिस अध्यापक को पाठ्यक्रम-सहगामी क्रियाओं का संचालक बनाया जाए, उसे केवल मार्गदर्शन का ही कार्य करना चाहिए।

8. अध्यापक की अभिरुचियों का ध्यान रखा जाए  - पाठ्यक्रम-सहगामी क्रियाओं के उत्तरदायित्व का वितरण करते समय अध्यापकों की रूचियों का भी ध्यान रखा जाए।  

उपर्युक्त सभी उद्देश्यों एवं सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय विद्यालय, राष्ट्रपति परिसर में विद्यालय की प्राचार्या, उप प्राचार्य एवं मुख्याध्यापिका के कुशल निर्देशन, शिक्षकों के मार्गदर्शन एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता के साथ वर्षपर्यंत पाठ्य सहगामी क्रियाओं का सोद्देश्य एवं सफलतापूर्वक संचालन किया जाता है।

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Thursday, July 23, 2020

आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं।

         श्रन में गाँठ न बांधें,नहीं तो 
         गले की फांस बन जाती हैं।

         आत्‍महत्‍या किसी समस्‍या का समाधान नहीं है। अगर आपको सहारे की जरूरत है तो अपने प्रियजनों का सहारा बेहिचक लें या आप किसी ऐसे शख्‍स को जानते हैं, जिसे मदद की दरकार है तो आप उसके मददगार बन जाइए और नहीं तो कृपया अपने नजदीकी मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ के पास जाएं। ऐसा करके न सिर्फ जि़न्दगी बचाई जा सकती है बल्कि ऐसा करके दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन सकते हैं। आपका जीवन किसी के अमूल्य है। 
स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें 
और सामाजिक बने रहें। 

Monday, December 3, 2018


एक दीया सबकी खुशहाली के नाम
इस दिवाली में ऐसा दीया जलाएं कि
सभी के दिलों से ‘अँधेरे’ का नाश हो
सदा के लिए हर दिल में प्रकाश हो
हर आँगन में लक्ष्मी का निवास हो|
दुःख, दर्द एवं दरिद्रता का नाश हो
भय, भूख, भ्रष्टाचार का विनाश हो
जाति व धर्म का ना नामो निशां हो
सत्तासीन लोगों के अहं का नाश हो
पूरी दुनिया में समरसता का वास हो|
न किसी दिल में कोई ‘मैल’ रह जाए
न ही किसी के घर का चूल्हा उदास हो
न रहे किसी के घर में कहीं भी अंधेरा
घर के हर कोने में रोशनी का वास हो
आइए, आज एक दीया ऐसा भी जलाएँ |

Friday, November 30, 2018

फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की रचनाओं में आंचलिकता व लोक संस्कृति : ‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के सन्दर्भ में
       
फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में ग्रामांचल को समग्र रूप में चित्रित करने वाले एक सफल और अद्वितीय साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं | उनकी रचनाओं में जीवन की वास्तविकता का प्रतिबिंब दृष्टिगोचर होता है| रेणु का रचना संसार एक ईमानदार लेखक की सहज अभिव्यक्ति है| जीवन के घात प्रतिघातों से जूझते हुए उन्होंने समाज के व्यापक धरातल को अतिशय बारीकी से देखा और परखा है| इस प्रयास में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक धरातल की कसौटी पर अपनी रचनाओं में कसा है और उनकी सभी रचनाएं इस पर खरी भी उतरी हैं| इसमें कोई दो राय नहीं कि रेणु एक स्थापित आंचलिक कथाकार हैं लेकिन इससे भी बढ़कर वह मानव संबंधों के सफल कथाकार हैं| चूँकि रेणु की पृष्ठभूमि ग्रामीण है और उनका रचना संसार भी भारतीय गांव है, उन्होंने अपनी रचनाओं में आजादी के पूर्व से लेकर बाद तक के भारतीय ग्रामीण समाज के संबंधों पर यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचय दिया है|
         ग्रामीण समाज एवं संस्कृति को अभिव्यक्त करने के लिए जिस ग्रामीण भाषा शैली का प्रयोग होना चाहिए रेणु ने उसका पूरा पूरा ध्यान रखा है| यूं कहा जाए कि रेणु की ग्रामीण पृष्ठभूमि, रचना संसार में अभिव्यक्त ग्राम जगत की संपूर्णता और उस संपूर्णता को प्रस्तुत करने के लिए ‘देसी’ भाषा शैली का चयन, यह सभी पक्ष रेणु के प्रति आत्मीयता का बोध कराने वाले हैं| उनकी भाषा ‘इंडिया’ पर ‘भारत’ के छा जाने की भाषा है| रेणु के उपन्यासों में ग्रामीण समाज का सच और समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों के संबंधों का सटीक चित्रण है जो संवेदनशील लोगों को हमेशा आकर्षित और प्रेरित करती है कि रेणु के इस दृष्टिकोण को समझा जाए| स्वातंत्र्योत्तर भारत के गांवों में सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक दृष्टि से जो बदलाव देखे गए हैं उसके प्रत्येक पक्ष पर रेणु ने अपने कथा साहित्य में जिस तरह से विचार व्यक्त किया है उन्हीं पक्षों को ध्यान में रखते हुए रेणु की रचनाओं में स्वातंत्र्योत्तर भारत के ग्रामीण समाज का बदलता सच देखा जा सकता है|
    रेणु की रचनाओं के माध्यम से उनके आर्थिक दृष्टिकोण को भी समझा जा सकता है |आजाद भारत के गांवों में अर्थव्यवस्था के विविध पहलुओं ने किस प्रकार ग्रामीण समाज में हलचल पैदा कर दिया और गांव के परंपरागत संबंध किस प्रकार प्रभावित हुए, इसे रेणु ने अपने कथा साहित्य में बेबाकी के साथ स्पष्ट किया है| रेणु की ग्रामीण संवेदना का जो एक धरातल ‘मैला आंचल’  में अभिव्यक्त हुआ है, वह आगे उनकी रचनाओं में और भी विस्तृत होता जाता है|                                                                         
हिंदी में ग्राम्य जीवन पर लिखने वाले रचनाकारों के क्रम में रेणु का नाम ऐसे समर्थ रचनाकार के रूप में लिया जाता है जिन्होंने ग्रामीण जीवन को एक विशेष प्रकार की अभिव्यक्ति दी है| एक ऐसी अभिव्यक्ति जिसमें गवंई आत्मीयता की सोंधी गंध थी और यही गंध रेणु को अन्य ग्रामीण कथाकारों से भिन्न करती है और बहुत दूर तक विशिष्ट भी| इतना ही नहीं रेणु संभवतः हिंदी ग्राम्य कथा साहित्य के पहले रचनाकार हैं जिनमें गांवों की परिवर्तित अनगढ़ राजनीतिक चेतना का स्वरूप अपनी पूरी गत्यात्मकता में रूपायित हुआ है|                                                            
          आंचलिक कथाकारों में रेणु का स्थान सर्वोपरि है | रेणु के कथा साहित्य में वास्तव में ग्रामीण जीवन के जितने सुन्दर सजीव और सवाक चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्यत्र संभव नहीं | स्वतन्त्रता प्राप्ति के काल और उसके पश्चात के गाँवों का सामाजिक तथा राजनीतिक चित्र उनकी रचनाओं में अत्यंत कुशलता से उकेरे गए हैं | अपनी रचनाओं में गांव की छोटी-छोटी घटनाओं, रीति रिवाजों, रूढ़ियों-परंपराओं, उनकी विचारधारा और पारस्परिक संबंधों को उनकी संश्लिष्टता व समग्रता में चित्रित कर देने के कारण ही रेणु की रचनाएं हिंदी साहित्य की उपलब्धि बन गई हैं|
       ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में भी कई रंग देखने को मिलते हैं। इसमें लोक संस्कृति अपनी कई विशेषताओं के साथ अभिव्यक्त होती है। रेणु की लेखनी में गांव, अंचल और लोक संस्कृति को सजीव करने की अद्भुत क्षमता है। पात्रों एवं परिवेश का इतना जीवंत चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। रेणु ने गद्य में भी संगीत पैदा कर दिया है।अन्यथा ढोलक की उठती गिरती आवाज़ और पहलवान के क्रिया –कलापों का ऐसा सामंजस्य भी दुर्लभ है | यह रेणु की रचनाधर्मिता और प्रयोगधर्मिता ही है कि वे वाद्य यंत्रों की ध्वनियों को शब्दबद्ध कर देते हैं और उन शब्दों को अर्थ भी प्रदान करते हैं | रेणु की रचनाओं में नायक कोई व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा अंचल ही नायक है| नायकत्व की अवधारणा को नई दिशा देने वाले रेणु यहीं नहीं रूकते बल्कि वे गुरू की अवधारणा को भी बदलते हुए दिखते हैं ,तभी तो पहलवान का गुरू कोई व्यक्ति नहीं अपितु एक ढोल है |
       प्रस्तुत कहानी लोक कला के महत्व व व्यवस्था के बदलने के साथ लोक कला के अप्रासंगिक हो जाने की भी कहानी है। राजा की जगह राजकुमार का आना सिर्फ व्यक्तिगत सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि लोक परंपरा के पोषक व्यवस्था की जगह पूंजीवादी व्यवस्था के छा जाने की कहानी है। कह सकते हैं 'भारत' पर 'इंडिया' के छा जाने की समस्या है जो लुट्टन पहलवान को राज पहलवान से निरीहता की भूमि पर पटक देता है और जो लुट्टन कभी कुश्ती में चित्त नहीं हुआ, वह भूख से लड़ते हुए अंत में मौत के द्वारा ‘चित्त’ कर दिया जाता है। मैनेजर साहब का कथन भारतीय ग्राम जीवन की जातिगत कड़वी हकीकत को भी संकेतित करता है | यह पाठ कई प्रश्न हमारे सामने छोड़ जाती है -- क्या कला  की प्रासंगिकता व्यवस्था की  मुखापेक्षी है या उसका कोई स्वतंत्र मूल्य भी है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस पूंजीवादी/ बाजारवादी सोच के बीच लोक संस्कृति को बचाए रखना एक चुनौती है।
        अंततः कहा जा सकता है कि रेणु का साहित्य एक भोगे हुए यथार्थ की अभियक्ति है |रेणु एक सजग रचनाकार हैं| मैला आँचल की भूमिका में उनकी उक्ति इसका प्रमाण भी है – “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, कीचड़ भी है, चन्दन भी, सुन्दरता भी है, कुरूपता भी –- मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया|” और मेरा मानना है कि एक ईमानदार रचनाकार को इनसे बचना भी नहीं चाहिए|   

डॉ. शुभ नारायण सिंह                                                                                     

Sunday, April 27, 2014

मास्को प्रवास

मास्को प्रवास
        बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने बैठा हूँ ।घर से दूर ,वतन से दूर मास्को में नौक्ररी बजा रहा हूँ।पहली बार विदेश की धरती पर कदम रखा है। ठेठ देहाती व्यक्ति हूँ। मेरी मनःस्थिति को बखूबी समझा जा सकता है। 1अप्रैल,14 को यहाँ आना हुआ,तब से मन अस्थिर है,अभी एडजस्ट होने की कोशिश कर रहा हूँ।बहुत मायने में यहाँ अलग महसूस कर रहा हूँ।पहले ही दिन बर्फीली हवाओं व बर्फ की चादर ढकी मास्को ने हमारा स्वागत किया। बावजूद इसके अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से करने की कोशिश कर रहा हूँ,आप सभी के शुभकामनाओं की दरकार है।.....

Monday, September 13, 2010

हिन्दी दिवस के बहाने

हम सभी को विदित है कि प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी मात्र हमारी भाषा ही नहीं वरन हमारी संस्कृति भी है तभी तो खडी. बोली के प्रथम कवि अमीर खुसरो से लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी तक ने सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनैतिक और समग्रत: राष्ट्रीय महत्व को समझते हुए सभी ने इसे ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्जा प्रदान करने की माँग की थी।लेकिन वर्तमान भारतीय परिवेश में ‘हिन्दी दिवस’ औपचारिकताओं का निर्वाह मात्र रह गया है। प्रतिवर्ष इस दिवस पर साहित्यिक कार्यक्रमों यथा, गोष्ठियों,भाषण व वाद-विवाद प्रतियोगिता, पुरस्कार वितरण आदि का आयोजन कर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं।
लेकिन भारतीय हिन्दी साहित्य में नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पंक्ति---
‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
निज भाषा उन्नति बिन, मिटै न हिय को सूल ॥
की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय स्वाधीनता में इसकी उपयोगिता को देखते हुए ही कहा था कि “हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।‘’ स्वराज(राजनैतिक) तो प्राप्त हुआ पर न जाने हिन्दी कहाँ रह गई।
भारतीय नवजागरण चेतना से संपन्न सुधारकों ने हिन्दी को उचित स्थान प्रदान करवाने हेतु अथक प्रयास किया। पर स्वतंत्रता के पश्चात हमारे शाषकों ने धीरे-धीरे बिसारना शुरू कर दिया है। संविधान की धारायें महज औपचारिकता बन कर रह गईं हैं और हिन्दी धीरे-धीरे ‘राजभाषा’ की श्रेणी से भी नीचे उतर रही है।
आज हम विश्व भूमंडलीकरण, तकनीकीकरण और पूँजीवादी संस्कृति के नाम पर हिन्दी को पीछे धकेलते जा रहे हैं।यह शासक वर्ग की एक दूरगामी चाल है ताकि देश की उन्नति में समस्तजनों की सहभागिता न हो सके और उनकी सियासत बनी रहे।सभी ‘हिन्दवासियों’ को चाहिए कि वे हिन्दी को उचित स्थान दिलाने का हरसंभव प्रयास करें क्योंकि भारतीय संस्कृति को पुन: गरिमामय बनाने हेतु यह अत्यंत आवश्यक है। अत: मैं कह सकता हूँ कि “हिन्दी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी भी चाहिए। “ विश्व में हिन्द,हिन्द में हिन्दी जैसे दमके माथे पर बिन्दी।