Monday, December 3, 2018


एक दीया सबकी खुशहाली के नाम
इस दिवाली में ऐसा दीया जलाएं कि
सभी के दिलों से अँधेरे का नाश हो
सदा के लिए हर दिल में प्रकाश हो
हर आँगन में लक्ष्मी का निवास हो|
दुःख, दर्द एवं दरिद्रता का नाश हो
भय, भूख, भ्रष्टाचार का विनाश हो
जाति धर्म का ना नामो निशां हो
सत्तासीन लोगों के अहं का नाश हो
पूरी दुनिया में समरसता का वास हो|
किसी दिल में कोई मैलरह जाए
ही किसी के घर का चूल्हा उदास हो
रहे किसी के घर में कहीं भी अंधेरा
घर के हर कोने में रोशनी का वास हो
आइए, आज एक दीया ऐसा भी जलाएँ |

Friday, November 30, 2018

फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की रचनाओं में आंचलिकता व लोक संस्कृति : ‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के सन्दर्भ में
       
फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में ग्रामांचल को समग्र रूप में चित्रित करने वाले एक सफल और अद्वितीय साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं | उनकी रचनाओं में जीवन की वास्तविकता का प्रतिबिंब दृष्टिगोचर होता है| रेणु का रचना संसार एक ईमानदार लेखक की सहज अभिव्यक्ति है| जीवन के घात प्रतिघातों से जूझते हुए उन्होंने समाज के व्यापक धरातल को अतिशय बारीकी से देखा और परखा है| इस प्रयास में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक धरातल की कसौटी पर अपनी रचनाओं में कसा है और उनकी सभी रचनाएं इस पर खरी भी उतरी हैं| इसमें कोई दो राय नहीं कि रेणु एक स्थापित आंचलिक कथाकार हैं लेकिन इससे भी बढ़कर वह मानव संबंधों के सफल कथाकार हैं| चूँकि रेणु की पृष्ठभूमि ग्रामीण है और उनका रचना संसार भी भारतीय गांव है, उन्होंने अपनी रचनाओं में आजादी के पूर्व से लेकर बाद तक के भारतीय ग्रामीण समाज के संबंधों पर यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचय दिया है|
         ग्रामीण समाज एवं संस्कृति को अभिव्यक्त करने के लिए जिस ग्रामीण भाषा शैली का प्रयोग होना चाहिए रेणु ने उसका पूरा पूरा ध्यान रखा है| यूं कहा जाए कि रेणु की ग्रामीण पृष्ठभूमि, रचना संसार में अभिव्यक्त ग्राम जगत की संपूर्णता और उस संपूर्णता को प्रस्तुत करने के लिए ‘देसी’ भाषा शैली का चयन, यह सभी पक्ष रेणु के प्रति आत्मीयता का बोध कराने वाले हैं| उनकी भाषा ‘इंडिया’ पर ‘भारत’ के छा जाने की भाषा है| रेणु के उपन्यासों में ग्रामीण समाज का सच और समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों के संबंधों का सटीक चित्रण है जो संवेदनशील लोगों को हमेशा आकर्षित और प्रेरित करती है कि रेणु के इस दृष्टिकोण को समझा जाए| स्वातंत्र्योत्तर भारत के गांवों में सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक दृष्टि से जो बदलाव देखे गए हैं उसके प्रत्येक पक्ष पर रेणु ने अपने कथा साहित्य में जिस तरह से विचार व्यक्त किया है उन्हीं पक्षों को ध्यान में रखते हुए रेणु की रचनाओं में स्वातंत्र्योत्तर भारत के ग्रामीण समाज का बदलता सच देखा जा सकता है|
    रेणु की रचनाओं के माध्यम से उनके आर्थिक दृष्टिकोण को भी समझा जा सकता है |आजाद भारत के गांवों में अर्थव्यवस्था के विविध पहलुओं ने किस प्रकार ग्रामीण समाज में हलचल पैदा कर दिया और गांव के परंपरागत संबंध किस प्रकार प्रभावित हुए, इसे रेणु ने अपने कथा साहित्य में बेबाकी के साथ स्पष्ट किया है| रेणु की ग्रामीण संवेदना का जो एक धरातल ‘मैला आंचल’  में अभिव्यक्त हुआ है, वह आगे उनकी रचनाओं में और भी विस्तृत होता जाता है|                                                                         
हिंदी में ग्राम्य जीवन पर लिखने वाले रचनाकारों के क्रम में रेणु का नाम ऐसे समर्थ रचनाकार के रूप में लिया जाता है जिन्होंने ग्रामीण जीवन को एक विशेष प्रकार की अभिव्यक्ति दी है| एक ऐसी अभिव्यक्ति जिसमें गवंई आत्मीयता की सोंधी गंध थी और यही गंध रेणु को अन्य ग्रामीण कथाकारों से भिन्न करती है और बहुत दूर तक विशिष्ट भी| इतना ही नहीं रेणु संभवतः हिंदी ग्राम्य कथा साहित्य के पहले रचनाकार हैं जिनमें गांवों की परिवर्तित अनगढ़ राजनीतिक चेतना का स्वरूप अपनी पूरी गत्यात्मकता में रूपायित हुआ है|                                                            
          आंचलिक कथाकारों में रेणु का स्थान सर्वोपरि है | रेणु के कथा साहित्य में वास्तव में ग्रामीण जीवन के जितने सुन्दर सजीव और सवाक चित्र देखने को मिलते हैं उतने अन्यत्र संभव नहीं | स्वतन्त्रता प्राप्ति के काल और उसके पश्चात के गाँवों का सामाजिक तथा राजनीतिक चित्र उनकी रचनाओं में अत्यंत कुशलता से उकेरे गए हैं | अपनी रचनाओं में गांव की छोटी-छोटी घटनाओं, रीति रिवाजों, रूढ़ियों-परंपराओं, उनकी विचारधारा और पारस्परिक संबंधों को उनकी संश्लिष्टता व समग्रता में चित्रित कर देने के कारण ही रेणु की रचनाएं हिंदी साहित्य की उपलब्धि बन गई हैं|
       ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में भी कई रंग देखने को मिलते हैं। इसमें लोक संस्कृति अपनी कई विशेषताओं के साथ अभिव्यक्त होती है। रेणु की लेखनी में गांव, अंचल और लोक संस्कृति को सजीव करने की अद्भुत क्षमता है। पात्रों एवं परिवेश का इतना जीवंत चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। रेणु ने गद्य में भी संगीत पैदा कर दिया है।अन्यथा ढोलक की उठती गिरती आवाज़ और पहलवान के क्रिया –कलापों का ऐसा सामंजस्य भी दुर्लभ है | यह रेणु की रचनाधर्मिता और प्रयोगधर्मिता ही है कि वे वाद्य यंत्रों की ध्वनियों को शब्दबद्ध कर देते हैं और उन शब्दों को अर्थ भी प्रदान करते हैं | रेणु की रचनाओं में नायक कोई व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा अंचल ही नायक है| नायकत्व की अवधारणा को नई दिशा देने वाले रेणु यहीं नहीं रूकते बल्कि वे गुरू की अवधारणा को भी बदलते हुए दिखते हैं ,तभी तो पहलवान का गुरू कोई व्यक्ति नहीं अपितु एक ढोल है |
       प्रस्तुत कहानी लोक कला के महत्व व व्यवस्था के बदलने के साथ लोक कला के अप्रासंगिक हो जाने की भी कहानी है। राजा की जगह राजकुमार का आना सिर्फ व्यक्तिगत सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि लोक परंपरा के पोषक व्यवस्था की जगह पूंजीवादी व्यवस्था के छा जाने की कहानी है। कह सकते हैं 'भारत' पर 'इंडिया' के छा जाने की समस्या है जो लुट्टन पहलवान को राज पहलवान से निरीहता की भूमि पर पटक देता है और जो लुट्टन कभी कुश्ती में चित्त नहीं हुआ, वह भूख से लड़ते हुए अंत में मौत के द्वारा ‘चित्त’ कर दिया जाता है। मैनेजर साहब का कथन भारतीय ग्राम जीवन की जातिगत कड़वी हकीकत को भी संकेतित करता है | यह पाठ कई प्रश्न हमारे सामने छोड़ जाती है -- क्या कला  की प्रासंगिकता व्यवस्था की  मुखापेक्षी है या उसका कोई स्वतंत्र मूल्य भी है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस पूंजीवादी/ बाजारवादी सोच के बीच लोक संस्कृति को बचाए रखना एक चुनौती है।
        अंततः कहा जा सकता है कि रेणु का साहित्य एक भोगे हुए यथार्थ की अभियक्ति है |रेणु एक सजग रचनाकार हैं| मैला आँचल की भूमिका में उनकी उक्ति इसका प्रमाण भी है – “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, कीचड़ भी है, चन्दन भी, सुन्दरता भी है, कुरूपता भी –- मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया|” और मेरा मानना है कि एक ईमानदार रचनाकार को इनसे बचना भी नहीं चाहिए|   

डॉ. शुभ नारायण सिंह                                                                                     

Sunday, April 27, 2014

मास्को प्रवास

मास्को प्रवास
        बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने बैठा हूँ ।घर से दूर ,वतन से दूर मास्को में नौक्ररी बजा रहा हूँ।पहली बार विदेश की धरती पर कदम रखा है। ठेठ देहाती व्यक्ति हूँ। मेरी मनःस्थिति को बखूबी समझा जा सकता है। 1अप्रैल,14 को यहाँ आना हुआ,तब से मन अस्थिर है,अभी एडजस्ट होने की कोशिश कर रहा हूँ।बहुत मायने में यहाँ अलग महसूस कर रहा हूँ।पहले ही दिन बर्फीली हवाओं व बर्फ की चादर ढकी मास्को ने हमारा स्वागत किया। बावजूद इसके अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से करने की कोशिश कर रहा हूँ,आप सभी के शुभकामनाओं की दरकार है।.....

Monday, September 13, 2010

हिन्दी दिवस के बहाने

हम सभी को विदित है कि प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी मात्र हमारी भाषा ही नहीं वरन हमारी संस्कृति भी है तभी तो खडी. बोली के प्रथम कवि अमीर खुसरो से लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी तक ने सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनैतिक और समग्रत: राष्ट्रीय महत्व को समझते हुए सभी ने इसे ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्जा प्रदान करने की माँग की थी।लेकिन वर्तमान भारतीय परिवेश में ‘हिन्दी दिवस’ औपचारिकताओं का निर्वाह मात्र रह गया है। प्रतिवर्ष इस दिवस पर साहित्यिक कार्यक्रमों यथा, गोष्ठियों,भाषण व वाद-विवाद प्रतियोगिता, पुरस्कार वितरण आदि का आयोजन कर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं।
लेकिन भारतीय हिन्दी साहित्य में नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पंक्ति---
‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
निज भाषा उन्नति बिन, मिटै न हिय को सूल ॥
की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय स्वाधीनता में इसकी उपयोगिता को देखते हुए ही कहा था कि “हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।‘’ स्वराज(राजनैतिक) तो प्राप्त हुआ पर न जाने हिन्दी कहाँ रह गई।
भारतीय नवजागरण चेतना से संपन्न सुधारकों ने हिन्दी को उचित स्थान प्रदान करवाने हेतु अथक प्रयास किया। पर स्वतंत्रता के पश्चात हमारे शाषकों ने धीरे-धीरे बिसारना शुरू कर दिया है। संविधान की धारायें महज औपचारिकता बन कर रह गईं हैं और हिन्दी धीरे-धीरे ‘राजभाषा’ की श्रेणी से भी नीचे उतर रही है।
आज हम विश्व भूमंडलीकरण, तकनीकीकरण और पूँजीवादी संस्कृति के नाम पर हिन्दी को पीछे धकेलते जा रहे हैं।यह शासक वर्ग की एक दूरगामी चाल है ताकि देश की उन्नति में समस्तजनों की सहभागिता न हो सके और उनकी सियासत बनी रहे।सभी ‘हिन्दवासियों’ को चाहिए कि वे हिन्दी को उचित स्थान दिलाने का हरसंभव प्रयास करें क्योंकि भारतीय संस्कृति को पुन: गरिमामय बनाने हेतु यह अत्यंत आवश्यक है। अत: मैं कह सकता हूँ कि “हिन्दी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी भी चाहिए। “ विश्व में हिन्द,हिन्द में हिन्दी जैसे दमके माथे पर बिन्दी।

Friday, January 22, 2010

रेणु के जीवन के दो सच

  सर्वप्रथम हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान को साधुवाद एवं धन्यवाद!आज के व्यावसायिक दौर मंल जहाँ खबरें भी बाजारवादी हो गई हैं ऐसे दौर में इस दैनिक पत्र द्वारा देश के महान साहित्यकारों से जुडी खबरें प्रमुखता से प्रकाशित करना रेगिस्तान में नखलिस्तान बनाने जैसा है। 
  महान क्रांतिकारी, राजनैतिक चेतना संपन्न व्यक्तित्व, आंचलिकता के प्रणेता एवं कथाशिल्पी –फ़णीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने वही सिरजा जिसे देखा और भोगा। ऐसे विरले कथाकार के निधन के लंबे अंतराल के बाद चौंकाने वाली दो खबरें ‘हिन्दुस्तान’ के द्वारा हम तक पहुँची ।पहली खबर-पद्मा रेणु एवं लतिका जी का मिलन जैसे गंगा-यमुना का मिलन। इस खबर ने सभी साहित्यप्रेमियों को सुखद आश्चर्य से ओत-प्रोत कर दिया। इन दोनों का मिलन यह दिखाता है कि उनपर रेणु जी के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव है जिन्होंने स्व से ज्यादा समाज को महत्व दिया था। साथ ही,रेणु जी के व्यक्तित्व व कृतित्व में कई नए आयाम जुडेंगे। 
  लेकिन दूसरी खबर ‘रेणु जी के इलाज़ में बरती गई थी लापरवाही’ सभी चेतनशील जनों के हृदय को गहरा आघात पहुँचाता है। यह एक स्तब्धकारी सत्य है जो क्षण भर के लिए मुझे चेतनशून्य कर गया। रेणु जैसे लब्ध प्रतिश्ठित साहित्यकार के साथ पी एम सी एच के डॉक्टरों, अस्पताल प्रशासन द्वारा ऐसा रवैया समाज में साहित्यकारों के प्रति संवेदनहीनता व अमानवीयता को तो दर्शाता ही है, साथ ही वी आई पी के प्रति उनकी चाटुकारिता को भी उजागर करता है। धरती पर भगवान के प्रतिरूप माने जाने वाले डॉक्टर भी मरीजों से पद-पैसा के अनुसार भेद –भाव करते हैं। उनका यह कृत्य न सिर्फ अपने पेशे के प्रति जघन्य अपराध है बल्कि मानवता के प्रति भी अपराध है और एक मरीज के विश्वास की हत्या भी है।
  डॉक्टरों द्वारा रेणु के इलाज में लापरवाही से असमय ही हिन्दी साहित्य-जगत का एक महान सर्जक सदा के लिए हमसे जुदा हो जाता है और साहित्य जगत भविष्य में होनेवाले उनके महान सृजन से भी वंचित हो जाता है।यह हर दृष्टि से घोर अपराध है और प्रत्येक साहित्य-प्रेमी इसकी घोर भर्त्सना करते हुए समुचित न्याय के लिए पद्मा रेणु व लतिका जी के साथ है।
डॉ. शुभ, के. वि. कंकडबाग, पटना

Sunday, August 2, 2009

फ्रेंडशीप डे के पुनीत अवसर पर

love a frnd who even hurts u. But never hurt a frnd who loves u.
Sacrifice everything 4a frnd,but never sacrifice a frnd 4 anything.
आज के संवेदनहीन भौतिकवादी युग में जहाँ सभी पुरातन व पारंपरिक संबंधों की गरमाहट समाप्त होती जा रही है, व्यक्ति स्वार्थवश अथवा मजबूरीवश सामाजिक-पारिवारिक संबंधों को जी नहीं पा रहा है, सभी तरह के संबंधों की पवित्रता लगभग मिटती जा रही है, रिश्तोंका मतलब जहाँ give&take relation रह गया है, जहाँ खून के रिश्ते भी बेमानी सिद्ध होने लगे हैं वहीं संबंधों की आत्मायता के इस संक्रमणकालीन दौर में भी एक रिश्ता ऐसा है जो संबंधों की आत्मीयता का अलख जगाए हुए है और वह है-- दोस्ती का रिश्ता।जी हाँ! आज भी यह एक ऐसा रिश्ता है जहाँ त्याग की भावना सर्वोपरि है। इस पुनीत अवसर मैं सभी दोस्तों के सफल व सुखद जीवन की कामना करता हूँ।

Sunday, May 10, 2009

क्या होती है माँ की ममता

ईश्वर धरती पर हर जगह नहीं पहुँच सकता इसलिए धरती पर ‘माँ’ को बनाया। आज ‘मदर्स डे’ है; आज की भौतिकवादी एवं पूँजीवादी दुनिया में व्यक्ति मशीन बनता जा रहा है, संवेदनाएँ ‘मशीन’ की भेंट चढ्ती जा रही हैं। नित्य संवेदनाओं की घटती के बीच आज भी माँ के प्रति लगाव कमोबेश विद्यमान है।इस पुनीत दिवस पर मेरे व मुझ जैसों की ओर से स्मृति स्वरूप...
क्या होती है माँ की ममता
माँ की ममता को समझ सकता है वही
जो है इससे महरूम
वो क्या खाक समझेंगे
माँकी ममता का महत्तव
जिनकी भोर होती है माँके वरदहस्त तले
दुपहरी जिनकी कट जाती है
माँ के आँचल की शीतल छाँव में
निशा की कालिमा से दूर
रात्रि जिनकी बीत जाती है
माँ की स्नेहमयी गोद में।
अरे! पूछो मुझ अभागे से
क्या होती है माँ की ममता
स्निग्ध ममता के महत्तव को
समझ सका था ना मैं भी
उस पुण्यात्मा की छत्रछाया
थी जबतक मेरे ऊपर
जा बैठी रश्मि किरणों के रथ पर
चल पडी स्वर्ग की राह
रास न आया मुझे माँ का स्वर्ग जाना
मैं स्वार्थी चिल्ला पडा
माँ... माँ.... माँ.....
न जा तू छोड मुझे,न बना अनाथ मुझे
कौन खिलाएगा अपने हाथों से खाना मुझे
कौन फेरेगा स्नेहमयी हाथ मेरे माथे पर
कौन देगा गोद मुझे अब
कहाँ मिलेगी मुझे वो थपकी
कौन कहेगा सो जा मेरे मुन्ने राजा
रात बहुत अब हो गयी है।
माँ ने मेरा क्रंदन न सुना
हो गई वह स्वर्गासीन
मुझे समझ आया तब
क्या होती है माँ की ममता
संभल जाओ,
संभल जाओ ए माँ की संतानों
कर दो न्योछावर जान अपनी
क्योंकि है वो तुम्हारी जननी
वरना,पछताओगे तुम भी मेरी तरह
हाय! कर न सका कुछ माँ के लिए
चित्कार कर उठोगे
जिस माँ ने मुझे लहू से सींचा
अंत समय उसे जल भी न दे सका
तब आएगी तुम्हें भी समझ
क्या होती है माँ की ममता।