Wednesday, July 29, 2026

गुरू पूर्णिमा : ज्ञान, संस्कार और आत्मबोध का महापर्व

 

गुरू पूर्णिमा : ज्ञान, संस्कार और आत्मबोध का महापर्व

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

आषाढ़ पूर्णिमा का पावन पर्व गुरू पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की उस अमर परंपरा का उत्सव है, जिसमें गुरू को केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का पथप्रदर्शक, संस्कारों का संवाहक और व्यक्तित्व का निर्माता माना गया है। आज का यह पावन दिवस अपने प्रथम गुरू अपने माता-पिता और श्रद्धेय गुरूओं के महान व्यक्तित्व और उनके योगदानों को स्मरण व नमन करने का है । यह दिन भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने वाले महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है  

भारतीय चिंतन परंपरा में गुरू वह प्रकाश है, जो अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर विवेक, सत्य और आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित करता है। गुरू केवल पुस्तकीय ज्ञान का संचारक नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्यबोध, नैतिकता और राष्ट्रसेवा की भावना का भी संस्कार देते हैं। एक श्रेष्ठ गुरू अपने शिष्य में केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करता है और एक आदर्श शिष्य वह है जो विनम्रता, अनुशासन, जिज्ञासा तथा निरंतर सीखने की भावना को अपने जीवन का आधार बनाता है।

आज जब भारत राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से ज्ञान, कौशल, नवाचार, भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्यपरक शिक्षा के समन्वय के साथ “विकसित भारत@2047” के निर्माण की दिशा में अग्रसर है, तब गुरू-शिष्य परंपरा का महत्व और भी बढ़ जाता है। हमारे शिक्षक नई पीढ़ी को केवल भविष्य के लिए तैयार नहीं कर रहे, बल्कि ऐसे उत्तरदायी नागरिक गढ़ रहे हैं जो मानवता, संवेदनशीलता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत हों।  

बदलते गुरु-शिष्य संबंध : परंपरा से प्रगति की ओर -- गुरू पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो हमें गुरू -शिष्य परंपरा के शाश्वत मूल्यों का स्मरण कराता है। लेकिन समय के साथ शिक्षा के स्वरूप, तकनीक और संसाधनों में व्यापक परिवर्तन आया है। आज डिजिटल माध्यमों, कृत्रिम  बुद्धिमत्ता और वैश्विक ज्ञान-संसाधनों ने सीखने की संभावनाओं का विस्तार किया है। इन परिवर्तनों के बीच गुरू की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जानकारी अनेक स्रोतों से मिल सकती है, परंतु सही दिशा, विवेक, मूल्यबोध और जीवन-दृष्टि केवल एक गुरू ही प्रदान कर सकता है।  इसी प्रकार आज के शिष्य के लिए भी यह आवश्यक है कि वह केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित न रहे, बल्कि सीखने की निरंतर जिज्ञासा, गुरुओं के प्रति सम्मान और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बनाए। गुरू और शिष्य का संबंध अधिकार का नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद, सम्मान और सतत सीखने की साझेदारी का संबंध है।  

 आइए, आज हम सब यह संकल्प लें कि बदलते समय के साथ शिक्षा के साधन भले बदलें, पर गुरू-शिष्य परंपरा के मूल मूल्य - श्रद्धा, ज्ञान, संस्कार, संवाद और समर्पण - सदैव अक्षुण्ण रहें। इस पावन अवसर पर, मैं अपने सभी गुरूजनों और शिक्षक साथियों के प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। आपका समर्पण, तप और सेवा ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है। साथ ही, मैं सभी विद्यार्थियों से आग्रह करता हूँ कि वे अपने गुरूओं के प्रति सम्मान, विश्वास और सीखने की जिज्ञासा आजीवन बनाए रखें। यही गुरू-दक्षिणा का सर्वोत्तम स्वरूप है। यही गुरू-परंपरा के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी।  

ज्ञान, संस्कार और सेवा का यह प्रकाश हम सभी के जीवन को निरंतर आलोकित करता रहे।

            पुनः सभी गुरूजनों एवं प्यारे विद्यार्थियों को गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

सादर/सप्रेम,

डॉ शुभ

Tuesday, July 21, 2026

महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा : अध्यात्म, संस्कृति और समावेशी समाज की यात्रा का संगम

 

महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा : अध्यात्म, संस्कृति और समावेशी समाज की यात्रा का संगम

ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा सनातन धर्म के सबसे भव्य और पवित्र सांस्कृतिक उत्सवों में से एक है, जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आरंभ होती है। इस नौ दिवसीय महापर्व में महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान श्री बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने भव्य और विशाल लकड़ी के रथों में सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए अपनी मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) जाते हैं। यह भव्य और दिव्य रथ यात्रा महाप्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के प्रेम और उनके भक्तों के प्रति समर्पण का प्रतीक है| यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि मानव एकता और समानता का एक विशाल उत्सव है जिसमें सभी जाति और धर्म के लोग शामिल होते हैं|

इस दिव्य रथ यात्रा की अपनी अनूठी और भव्य विशेषताएं हैं :-  

रथों के नाम: भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष', बलभद्र के रथ को 'तालध्वज' और सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' कहा जाता है। ये तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं और बेहद ऊंचे और आकर्षक होते हैं।

परंपराएं: यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों के आगे का रास्ता साफ करते हैं, जिसे 'छेरा पहँरा' कहा जाता है। इसके बाद ही लाखों श्रद्धालु मिलकर इन विशाल रथों को खींचते हैं | पुरी के मुख्य मंदिर से गुंडीचा मंदिर के बीच की यह दिव्य यात्रा लगभग 3 किलोमीटर की होती है।

महाप्रभु जगन्नाथ के रथ के सारथी 'दारुक' हैं और रथ पर लगा ध्वज 'कपिलध्वज' कहलाता है। गुंडीचा मंदिर में बिताए गए इन 9 दिनों के दौरान भगवान के दर्शन को आड़प-दर्शन कहते हैं और यहाँ मिलने वाला प्रसाद महाप्रसाद माना जाता है। यात्रा के नौवें दिन 'बहुड़ा यात्रा' (घर वापसी) होती है। वापसी के समय रथ मंदिर के सिंहद्वार के पास रुकते हैं और 'सोना बेशी' (स्वर्ण आभूषणों का शृंगार) के दर्शन होते हैं।

यह पवित्र रथयात्रा महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के अपने भक्तों को दर्शन देने और गुंडीचा मंदिर जाने का उत्सव है। यह भव्य पर्व जाति और धर्म से परे सभी को ईश्वर के साक्षात दर्शन और उनके 'महाप्रसाद' का लाभ प्राप्त करने का अवसर देता है।

इस दिव्य रथ यात्रा का अपना महत्व है:-

समानता और प्रेम का प्रतीक: रथयात्रा ऐसा अवसर है जब भक्त बिना किसी भेदभाव के स्वयं भगवान के रथ की रस्सियों (पवित्र रथ नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन) को खींच सकते हैं। इसे अहंकार और सांसारिक बंधनों को तोड़ने का प्रतीक माना जाता है।

भक्ति का विस्तार: यह यात्रा जगत के नाथ को उनके गर्भगृह से निकालकर आम जन की सड़कों (बड़ा डंडा) पर लाती है, जिससे वे पतित पावन के रूप में सभी प्राणियों को अपना आशीर्वाद देते हैं।

नौ दिवसीय यात्रा और मोक्ष: तीनों विग्रह गुंडीचा मंदिर में 9 दिन तक विश्राम करते हैं। मान्यता है कि इन नौ दिनों में रथ के दर्शन करने या यात्रा में शामिल होने मात्र से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

आज के इस पावन अवसर पर मेरी हार्दिक कामना है कि महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा का दिव्य आशीर्वाद आपके और आपके परिवार पर हमेशा बना रहे। यह पावन पर्व आपके जीवन में नई आशा, सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।

जय जगन्नाथ!"

 

Tuesday, December 16, 2025

दुनिया के सबसे बड़े स्कूल ऑर्गेनाइजेशन, केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) के स्थापना (15 दिसंबर 1963) के उपलब्धिपूर्ण 62 वर्ष

केंद्रीय विद्यालय संगठन के कर्मठ कर्मी, सम्मानित शिक्षकवृंद और देश के भविष्य प्यारे विद्यार्थियों,

आप सभी को देश ही नहीं, दुनिया के सबसे बड़े स्कूल ऑर्गेनाइजेशन, केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) के 63वें स्थापना दिवस (15 दिसंबर 1963) की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ!

15 दिसंबर का दिन सभी केवियंस के लिए गौरव, आत्ममंथन और संकल्प का दिन है। वर्ष 1963 में स्थापित केवीएस ने पिछले छह दशकों से अधिक समय में राष्ट्र-निर्माण की नींव को सशक्त करते हुए गुणवत्ता, समानता और समावेशन के साथ भारतीय शिक्षा की विरासत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।

केंद्रीय विद्यालय केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं हैं—ये भारत की आत्मा, उसकी विविधता में एकता के जीवंत केंद्र हैं। देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक, केवीएस ने अनुशासन, वैज्ञानिक दृष्टि, संवैधानिक मूल्य और राष्ट्रीय चेतना को विद्यार्थियों के जीवन में गहराई से रोपा है। यह उपलब्धि सभी—कर्मियों की निष्ठा, शिक्षकों के समर्पण, विद्यार्थियों की जिज्ञासा व परिश्रम और अभिभावकों के अमूल्य सहयोग—का प्रतिफल है।

शिक्षकों से मेरा विशेष आह्वान - आप ज्ञान के संवाहक ही नहीं, भविष्य के शिल्पकार, राष्ट्र-निर्माता हैं। बदलते समय में 21वीं सदी के कौशल, नवाचार, डिजिटल दक्षता और मानवीय संवेदनाओं का संतुलन बनाए रखते हुए विद्यार्थियों को सोचने, प्रश्न करने और समाधान खोजने के लिए प्रेरित करें। मूल्य-आधारित शिक्षा, करुणा और राष्ट्रप्रेम—यही आपकी सबसे बड़ी शिक्षाएँ हैं।

कर्मियों से अपेक्षा - आप संगठन की रीढ़ हैं। परिश्रम, पारदर्शिता, सेवा-भाव और दक्षता के साथ कार्य करते हुए  संगठन को और अधिक सुचारु, सुरक्षित और सशक्त बनाइए। आपका बहुमूल्य योगदान केवीएस शिक्षा-परिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और गति का आधार है।

प्रिय विद्यार्थियों!आप भारत का उज्ज्वल भविष्य हैं। ज्ञान के साथ चरित्र, आत्मविश्वास के साथ विनम्रता और सफलता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को अपनाइए। विज्ञान, खेल, कला और सेवा—हर क्षेत्र में उत्कृष्टता का लक्ष्य रखें और “सबका साथ, सबका विकास” के भाव को अपने जीवन में उतारें। 

आशा ही नहीं, मुझे विश्वास है कि केवीएस कर्मी, शिक्षक एवं विद्यार्थी समन्वित रूप से समावेशी शिक्षा के माध्यम से समावेशी संस्कृति एवं 'विकसित भारत' के लक्ष्य की प्राप्ति में महति भूमिका अदा करेंगे।

आज, केवीएस स्थापना दिवस के इस ऐतिहासिक अवसर पर, मैं आप सभी से एक सामूहिक संकल्प लेने का शिक्षा को नवाचार और समावेशन के साथ आगे बढ़ाने का, हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाने का और भारत को ज्ञान-आधारित, आत्मनिर्भर एवं करुणामय राष्ट्र बनाने का आह्वान करता हूँ।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि केंद्रीय विद्यालय संगठन अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेते हुए भविष्य में भी राष्ट्र को नेतृत्व, नवाचार और मानवीय मूल्यों से समृद्ध करता रहेगा।

स्थापना दिवस की पुन: हार्दिक शुभकामनाएँ। 

जय हिंद!     जय केवीएस!

Monday, March 31, 2025

बच्चे के व्यक्तित्व विकास में सांस्कृतिक गतिविधियों की भूमिका

 

बच्चे के व्यक्तित्व विकास में सांस्कृतिक गतिविधियों की भूमिका

Cultural Activities role of personality development of child

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विद्यार्थियों को जितना ज्ञान किताबों से मिलता है उससे कई गुना ज्ञान वे सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व खेलकूद गतिविधियों से हासिल करते हैं। 

शिक्षा के साथ-साथ छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकासात्मक गतिविधियों का आयोजन कराया जा रहा है वह छात्र-छात्राओं के मानसिक विकास के लिए अच्छा प्रयास है। खेलकूद व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए बच्चों का मानसिक व शारीरिक विकास होता है। विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन पूरे वर्ष भर किया जाता है| आज के इस प्रेजेंटेशन में हम जानेंगे विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियां के आयोजन प्रकार, विद्यालय में इन सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन का क्या महत्व और लाभ |

 विद्यालय में शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन भी छात्र के     विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अकादमिक शिक्षण के साथ-साथ विद्यार्थियों को सह शैक्षिक     प्रतियोगिताओं में भी भागीदारी करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है। इससे बालक में         सामाजिकता, नेतृत्व गुण, सामाजिक उपयोगिता, सहनशीलता की भावनाएं विकसित होती हैं और     बालक का सर्वांगीण विकास होता है।

विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने से आशय है-विद्यार्थियों को अपने समाज और देश की संस्कृति से अवगत कराना और भावी जीवन के लिए सामाजिकता की भावना भरना।

·         सांस्कृतिक गतिविधियों का तात्पर्य-- ऐसी गतिविधियाँ जो सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को मूर्त रूप देती हैं या व्यक्त करती हैं, भले ही उनका व्यावसायिक मूल्य कुछ भी हो। सांस्कृतिक गतिविधियाँ अपने आप में एक अंत हो सकती हैं या वे सांस्कृतिक वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में योगदान दे सकती हैं।

सांस्कृतिक जागरूकता और परंपरा छोटे बच्चों को पहचान की सकारात्मक भावना विकसित करने और आत्म-सम्मान बनाने में मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि सांस्कृतिक प्रशंसा और जागरूकता एक सकारात्मक आत्म छवि बनाने में योगदान करती है।

·         बचपन की शिक्षा में संस्कृति क्यों महत्वपूर्ण है? --- शोध से पता चलता है कि जो वयस्क बच्चों को सांस्कृतिक रूप से उत्तरदायी शैक्षिक अनुभवों में शामिल करते हैं वे निम्न में मदद करते हैं: छोटे बच्चों के आत्मविश्वास और कौशल का निर्माण करना । बच्चों की जागरूकता, प्रशंसा और विविध विश्वासों और संस्कृतियों को शामिल करना। बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धि और शैक्षिक सफलता को अधिकतम करें|

·         सांस्कृतिक गतिविधियां बनाम व्यक्तित्व विकास -- सांस्कृतिक कार्यक्रम हमारी संस्कृति का आइना होते हैं। किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभागिता करने से व्यक्ति का बौद्धिक विकास भी होता है।

·         सांस्कृतिक गतिविधियों के उद्देश्य -- गुणवत्ता और कलात्मक नवीनीकरण को बढ़ावा देना; एक गतिशील सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देना जो संरक्षित, उपयोग और विकसित है; अंतर्राष्ट्रीय और अंतर-सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सहयोग को बढ़ावा देना

·         संस्कृति के विकास में शिक्षा की भूमिका— शिक्षा सांस्कृतिक परिवर्तनों आदि की दृष्टि से महत्ती भूमिका निभाती है। इस विवेचन से स्पष्ट है कि शिक्षा द्वारा संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है तथा संस्कृति का विकास किया जाना संभव हो पाता है। इसका आशय है कि शिक्षा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक है और दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते है।

सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रकार

विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियां अनेक प्रकार से आयोजित की जा सकती हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन में उपलब्ध सह शैक्षणिक सामग्री और साधनों के आधार पर विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जा सकती हैं।विद्यालय में कुछ महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियां इस प्रकार हैं-

  • पाठ्य सहगामी गतिविधियां 
  • राष्ट्रीय पर्व की गतिविधियां 
  •  सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम
  • कला एवं संगीत के क्षेत्र की गतिविधियां 
  • साहित्यिक गतिविधियां 
  • खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन
  • क्विज प्रतियोगिता का आयोजन
  • वार्षिक समारोह कार्यक्रम
  • स्वास्थ्य और जीवन कौशल से संबंधित

सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्व

सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्व है कि विद्यार्थियों को अच्छे समाज और देश के हित में सुनागरिक  बनाकर जीवन क्षेत्र में उन्हें आगे बढ़ने और अच्छे समाज के निर्माण के लिए तैयार किया जा सके।

विद्यालय सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन से बालकों को अभूतपूर्व लाभ मिलता है और उन्हें मात्र सैद्धांतिक जीवन के बजाय प्रैक्टिकली जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है जिससे वे भावी जीवन के लिए आने वाले संघर्षों और कठिनाइयों से मुकाबला करने के लिए तैयार होते हैं।

सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने से विद्यार्थियों में बहुत सारे गुणों का विकास होता है। सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने का महत्व इस प्रकार हैं--

  • सामाजिकता की भावना का विकास
  • नेतृत्व क्षमता का विकास
  • शिक्षक और छात्रों में भावनात्मक लगाव
  • शिक्षक के प्रति छात्रों का व्यक्तिगत प्रेम व आदर
  • अनुशासन की भावना का विकास
  • सामंजस्य की भावना का विकास
  • परस्पर सहायता करने की प्रवृत्ति का विकास
  • आत्मविश्वास में वृद्धि विभिन्न कौशलों का विकास

·         सामाजिकता की भावना – सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने से विद्यार्थी में सामाजिकता की भावना का विकास होता है|

·         नेतृत्व की क्षमता विकास – सांस्कृतिक गतिविधियां विद्यार्थी को नेतृत्व क्षमता प्रदान करती हैं|

·         धैर्य और सहनशीलता – सांस्कृतिक गतिविधियों से बालक में धैर्य और सहनशीलता की भावना विकसित होती है|

·         शिक्षक और छात्रों में भावनात्मक लगाव – सांस्कृतिक गतिविधियों से शिक्षक और छात्रों में आपसी इसने हैं और लगाव की भावना उत्पन्न होती है जिससे शिक्षक छात्रों के रूचि और व्यवहार कौशल को समझ पाता है तथा उन्हें भविष्य में सही कैरियर चुनने में सहायता करता है।

·         शिक्षक के प्रति छात्रों का व्यक्तिगत प्रेम – छात्रों का अपने गुरु के प्रति सम्मान की भावना में वृद्धि होती है और छात्र शिक्षक के प्रति जुड़ाव महसूस करता है जिससे वह अपनी सामाजिक या व्यक्तिगत समस्याएं भी शिक्षक को बेझिझक बता सकता है।

·         अनुशासन की भावना विकसित होना – सांस्कृतिक गतिविधियों से छात्रों में अनुशासन की भावना का विकास होता है|

·         सामंजस्य की भावना -विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने के लिए छात्र एक दूसरे की जरूरतें महसूस करते हैं और उनमें सामंजस्य adjustment की भावना का तीव्र गति से विकास होता है। वे समकालीन परिस्थितियों के अनुसार और जरूरतों के अनुसार अपने आप को ढालने और सामंजस्य बैठाने की कोशिश करते हैं।

·         सहायता करना -सांस्कृतिक गतिविधियों में छात्र यह सीखते हैं कि एक दूसरे की सहायता कैसे की जाए, यह सहायता करने की भावना किसी को व्याख्या लेक्चर देने से नहीं पनपती बल्कि कार्य क्षेत्र में एक दूसरे के साथ किसी प्रोजेक्ट पर कार्य करने से अपने आप यह भावना विकसित होती हैं और छात्र ने केवल आपस में बल्कि समाज और परिवार में भी सहायता करने की भावना को सीखते हैं।

·         आत्मविश्वास उत्पन्न होना-जब विद्यार्थी मंच पर आकर प्रस्तुति देते हैं या कोई प्रोजेक्ट संबंधी कार्य करते हैं तो बालकों में आत्मविश्वास की भावना जागृत होती है, अपने आप पर कॉन्फिडेंस आता है और विपरीत परिस्थितियों में भी घबराते नहीं हैं बल्कि उन्हें यह आत्मविश्वास मजबूत और संघर्षों से सामना करने की शक्ति देता है।

·         विभिन्न कौशल का विकास-विद्यार्थियों में सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन के माध्यम से विभिन्न प्रकार के कौशल विकसित किए जा सकते हैं। यह कौशल हस्तशिल्प से लेकर कंप्यूटर या और भी कई टेक्नोलॉजी के प्रति हो सकता है। इन कौशल के माध्यम से विद्यार्थी के अंदर विभिन्न चीजों के प्रति आकर्षण बढ़ता है और वे इन्हें सहजता के साथ कर सकते हैं साथ ही भावी जीवन में इनसे कैरियर भी बना सकते हैं। वे छात्रों को नए कौशल हासिल करने में मदद करते हैं जिन्हें उनके जीवन में लागू किया जा सकता है, जैसे कि नेतृत्व, टीम वर्क, सहयोग और समस्या समाधान, जो उन्हें स्कूली जीवन के लिए तैयार करते हैं।

सांस्कृतिक गतिविधियों के लाभ

विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन करने का उद्देश्य होता है विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना। यदि आप विद्यालय में नियमित तौर पर सांस्कृतिक और सह शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन करते हैं तो विद्यार्थियों में निम्न गुण विकसित होते हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन से होने वाले लाभ।

विद्यार्थियों की राष्ट्र और समाज तथा गौरवशाली परंपरा को समझने में सहायता मिलती है

विद्यार्थी अपने गौरवशाली इतिहास और परंपराओं का सम्मान करना सीखता है

सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन से विद्यालय के विद्यार्थी अपनी पूर्व पीढ़ी के आचार विचार व्यवहार और परंपराओं से परिचित होते हैं

विद्यार्थियों को प्राचीन और आधुनिक सांस्कृतिक के बदलाव की समझ होती है और वह परंपरागत और आधुनिक संस्कृति को अच्छी तरह से समझ पाते हैं

विद्यार्थी सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से परंपरागत रूढ़ियों और अंधविश्वासों के प्रति जागरूक होते हैं

विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने से विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा मिलती है और उनमें नैतिक मूल्यों का विकास होता है

परंपराओं का अंधानुकरण करने के बजाए विद्यार्थी सही और गलत का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अवलोकन करते हैं

विद्यार्थी दैनिक जीवन में प्राचीन और उपयोगी आचार विचार और सांस्कृतिक परंपराओं की समझ से रूबरू होने से अपने जीवन में ढालने का प्रयास करते हैं।

विलुप्त हो रही सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति विद्यार्थी में जिज्ञासा भावना पैदा होती है और वे उनके महत्व को स्वीकार करते हैं

भारतीय संस्कृति और ज्ञान की परख होने के बाद वे वर्तमान परिस्थितियों और सामाजिक संदर्भों में इनका मूल्यांकन करना सीखते हैं

सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्र और समाज को महत्वपूर्ण और उपयोगी संदेश दिए जा सकते हैं जो किसी भी प्रचार प्रसार से अधिक प्रभावी होता है

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

·         विद्यार्थियों में सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति जागरूकता -- विद्यालय सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन से बालकों को अभूतपूर्व लाभ मिलता है और उन्हें मात्र सैद्धांतिक जीवन के बजाय प्रैक्टिकली जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है जिससे वे भावी जीवन के लिए आने वाले संघर्षों और कठिनाइयों से मुकाबला करने के लिए तैयार होते हैं।

·         स्कूली शिक्षा में सांस्कृतिक शिक्षा की जरूरत -  इससे बालक में सामाजिकता, नेतृत्व गुण, सामाजिक उपयोगिता, सहनशीलता की भावनाएं विकसित होती हैं और बालक का सर्वांगीण विकास होता है। विद्यालय में सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने से आशय है-विद्यार्थियों को अपने समाज और देश की संस्कृति से अवगत कराना और भावी जीवन के लिए सामाजिकता की भावना भरना।

·         बच्चों में सांस्कृतिक जागरूकता का विकास -- फिल्मों, कला, भोजन और कार्यक्रमों के माध्यम से अपने बच्चे को अंतर-सांस्कृतिक अनुभवों से परिचित कराएं । अपने बच्चे को स्वाभाविक रूप से जातीय विविधता से परिचित कराते हुए मज़े करें। अपने बच्चे को अन्य भाषाओं में आम वाक्यांशों को सिखाना उन्हें विविध संस्कृतियों को पहचानने में मदद करने का एक और तरीका है।

एक पेड़ की नियति

 

एक पेड़ की नियति

देख रहे हो न विनोद पेड़ को! फलों और फूलों से लदा इतरा रहा है, इतराए भी क्यों न! पेड़ के जीवन का सौंदर्य और उन्नति भी तो इसी में निहित है। लेकिन उससे ज्यादा उसकी शाखों पर लगे फूल और फल इतरा रहे हैं। अपने सौंदर्य और उपयोगिता के कारण उन्हें ऐसा लगता है कि पेड़ की उपादेयता हमारी वजह से है लेकिन उन्हें कौन समझाए!खैर, उधर पेड़ भी इन फूलों और फलों को देखकर फूला नहीं समा रहा। उसे लगता है कि उसका जीवन सफल और सार्थक हो गया।

लेकिन शायद पेड़ को अपनी नियति का भान नहीं था, समय के साथ फूल और फल दोनों ही उसे छोड़ चले। पेड़ निराश हुआ लेकिन हताश नहीं। उसने पुनः अपनी प्राण-वायु से स्वयं को फूलों और फलों से लकदक कर लिया लेकिन इसका हश्र भी वही हुआ, फल और फूल पुनः उसे छोड़ चले। ऐसी प्रक्रिया उसके साथ कई सालों तक चली। अंततः उसकी निराशा हताशा में बदलने लगी और वह टूटने लगा। इस टूटन की प्रक्रिया में फूलों और फलों के बाद पत्ते भी जो पेड़ों की वजह से हरे थे, उन्हें यह गुमान था कि इस पेड़ का जीवन तो मेरी वजह से है, वे भी धीरे-धीरे छोड़ चले। अब पेड़ फल-फूल-पत्र विहीन खड़ा है। अपनों के द्वारा जबरदस्ती वानप्रस्थ दे दिए जाने से यह पेड़ अंदर ही अंदर मरने लगा।

इस पेड़ को बीज से विशाल वृक्ष में बदलने वाले अब धीरे-धीरे उसकी टहनियों को कतरने लगे। अब वृक्ष खड़ा तो है लेकिन बिल्कुल ठूँठ, उसमें प्राण है या नहीं, कह पाना मुश्किल है। एक दिन ऐसा होता है कि उस पेड़ को अपने ही धराशायी कर देते हैं या वह जीवन भर थपेड़ों की मार सहता हुआ स्वयं ही धराशायी हो जाता है। वैसे वह मर तो कब का चुका था।  

-          शुभ  

Monday, October 23, 2023

पार्कनामा (अर्थात् एक सैर ऐसा भी)

 पार्कनामा... (अर्थात् एक सैर ऐसा भी)

50 पार का व्यक्ति जब शरीर और स्वास्थ्य पर अचानक ध्यान देने की कोशिश करने लगे तो शुरुआत होती है ऊलजलूल हरकतों की। और उनमें से ही एक है पार्ट टाइम पार्कनामा।

पिछले कुछ दिनों से स्वास्थ्य को लेकर मैं थोड़ा परेशान रहा और तब स्वास्थ्य के प्रति सजग होने की कोशिश करने लगा। हालांकि यह विदित है कि मैं किसी भी चीज के प्रति कभी भी बहुत ज्यादा अवेयर नहीं रहा। पेट का साइज उम्र बढ़ने के साथ बढ़ने लगा, जिससे शरीर और भी बेडौल होने लगा। मेरे कुछ साथी हालांकि वे उम्र में मेरे से  छोटे हैं, उन्होंने अपने मेंटेन शरीर को और मेंटेन करने की जो कोशिश की और उसका जो प्रमाण मुझे दिखा, बस! मैंने भी ठान लिया कि मुझे भी अपने पेट को अंदर करना है और शुरू हुआ पार्कनामा। सुबह को जब समय मिलता है, खासकर छुट्टियों के दिन तो  उस सुबह अनमने ढंग से ही सही उठकर सैर के लिए निकल जरूर पड़ता हूँ । 

विकासपुरी के इस पार्क में विभिन्न तरह के दृश्य देखने को मिलते हैं। योग करते बुजुर्ग, लाफिंग क्लब के बुजुर्ग ठहाके लगाते हुए, संघ की शाखा में गिने चुने लोग नमस्ते सदा वत्सले... करते हुए, ओपन जिम का भरपूर आनंद उठाते हुए जवान, बूढ़े और महिलाएँ। इन सबके बीच मैं अपने को सहज करने की कोशिश करता हूँ। खासकर योग करते, ओपन जिम पर एक्सरसाइज करते, ठहाके लगाते बुजुर्ग और सर्वधर्म का नारा लगाकर भारत की सांझी संस्कृति की विरासत को संजोए ये बुजुर्ग बहुत ही प्रेरित करते हैं।

कुछ ऐसे भी मिल जाते हैं जो पार्क में अपनी घरेलू समस्याओं से दो चार करते पार्क को घर बनाते हुए...... 

बड़ा ही खूबसूरत और अजीब नजारा होता है यहाँ। क्रमशः.....

Wednesday, October 12, 2022

जगने लगा हूँ, समझने लगा हूँ

जगने लगा हूँ , समझने लगा हूँ 

जिस 'नींद' में ख़्वाब आते बहुत थे 

उस नींद से अब मैं जगने लगा हूँ ।

जो  ख़्वाब 'हसीन' लगते  कभी थे

उस  ख़्वाब से अब बचने लगा हूँ ।

देखा  करीब  से जब  'ज़िंदगी' को

इसे  और बेहतर  समझने लगा हूँ।

उड़ता था शायद  मैं ऊँची बयार में 

ज़मी पर अब  पाँव रखने लगा  हूँ।

लफ़्ज़ों की मुझे  अब ज़रूरत नहीं 

चेहरों को जब से मैं पढ़ने लगा हूँ।

थक जाता हूँ अक्सर  जब शोर से

तन्हाइयों से बातें मैं करने लगा हूँ।

बदलते  आलम-ए अक्स  देखकर

शायद कुछ मैं भी बदलने लगा हूँ।

परवाह  नहीं, कोई साथ आए मेरे 

मैं अकेले ही  आगे बढ़ने लगा हूँ ।

जब मिला न किसी हाथ का साथ

मैं खुद ही नया कुछ गढ़ने लगा हूँ।।

   - शुभ