गुरू पूर्णिमा : ज्ञान, संस्कार और आत्मबोध
का महापर्व
गुरुर्ब्रह्मा
गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात्
परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
आषाढ़ पूर्णिमा का
पावन पर्व गुरू पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की उस अमर परंपरा का उत्सव है, जिसमें
गुरू को केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का
पथप्रदर्शक, संस्कारों का संवाहक और व्यक्तित्व का निर्माता
माना गया है। आज का यह पावन दिवस अपने प्रथम गुरू अपने माता-पिता और श्रद्धेय गुरूओं
के महान व्यक्तित्व और उनके योगदानों को स्मरण व नमन करने का है । यह दिन भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित
स्वरूप प्रदान करने वाले महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
भारतीय चिंतन परंपरा
में गुरू वह प्रकाश है,
जो अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर विवेक, सत्य
और आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित करता है। गुरू केवल पुस्तकीय ज्ञान का संचारक
नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्यबोध,
नैतिकता और राष्ट्रसेवा की भावना का भी संस्कार देते हैं। एक
श्रेष्ठ गुरू अपने शिष्य में केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि
चरित्र का निर्माण करता है और एक आदर्श शिष्य वह है जो विनम्रता, अनुशासन, जिज्ञासा तथा निरंतर सीखने की भावना को
अपने जीवन का आधार बनाता है।
आज जब भारत राष्ट्रीय
शिक्षा नीति-2020
के माध्यम से ज्ञान, कौशल, नवाचार, भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्यपरक शिक्षा के
समन्वय के साथ “विकसित भारत@2047” के निर्माण की दिशा में
अग्रसर है, तब गुरू-शिष्य परंपरा का महत्व और भी बढ़ जाता
है। हमारे शिक्षक नई पीढ़ी को केवल भविष्य के लिए तैयार नहीं कर रहे, बल्कि ऐसे उत्तरदायी नागरिक गढ़ रहे हैं जो मानवता, संवेदनशीलता,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत हों।
बदलते
गुरु-शिष्य संबंध : परंपरा से प्रगति की ओर -- गुरू पूर्णिमा भारतीय
संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो हमें गुरू -शिष्य परंपरा के शाश्वत
मूल्यों का स्मरण कराता है। लेकिन समय के साथ शिक्षा के स्वरूप, तकनीक और संसाधनों में व्यापक परिवर्तन आया है। आज डिजिटल माध्यमों,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और
वैश्विक ज्ञान-संसाधनों ने सीखने की संभावनाओं का विस्तार किया है। इन परिवर्तनों
के बीच गुरू की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जानकारी अनेक स्रोतों से
मिल सकती है, परंतु सही दिशा, विवेक,
मूल्यबोध और जीवन-दृष्टि केवल एक गुरू ही प्रदान कर सकता है। इसी प्रकार आज के शिष्य के लिए भी यह आवश्यक है
कि वह केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित न रहे, बल्कि
सीखने की निरंतर जिज्ञासा, गुरुओं के प्रति सम्मान और समाज
के प्रति उत्तरदायित्व को अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बनाए। गुरू और शिष्य का
संबंध अधिकार का नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद,
सम्मान और सतत सीखने की साझेदारी का संबंध है।
आइए, आज
हम सब यह संकल्प लें कि बदलते समय के साथ शिक्षा के साधन भले बदलें, पर गुरू-शिष्य परंपरा के मूल मूल्य - श्रद्धा,
ज्ञान, संस्कार, संवाद
और समर्पण - सदैव अक्षुण्ण रहें। इस पावन अवसर पर, मैं अपने
सभी गुरूजनों और शिक्षक साथियों के प्रति अपनी
हार्दिक श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। आपका समर्पण, तप और सेवा ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है। साथ ही, मैं सभी विद्यार्थियों से आग्रह करता हूँ कि वे अपने गुरूओं के प्रति
सम्मान, विश्वास और सीखने की जिज्ञासा आजीवन बनाए रखें। यही
गुरू-दक्षिणा का सर्वोत्तम स्वरूप है। यही गुरू-परंपरा के प्रति हमारी
सच्ची श्रद्धा होगी।
“ज्ञान, संस्कार और सेवा का यह प्रकाश हम सभी के जीवन
को निरंतर आलोकित करता रहे।“
पुनः सभी गुरूजनों एवं प्यारे विद्यार्थियों
को गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सादर/सप्रेम,
डॉ
शुभ
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