Friday, September 4, 2026
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: शाश्वत संदेश, कर्म की प्रेरणा और समकालीन प्रासंगिकता"
Sunday, August 2, 2026
मित्रता दिवस: रिश्तों में आत्मीयता और विश्वास का उत्सव
मित्रता केवल एक संबंध नहीं, बल्कि विश्वास, आत्मीयता, सहयोग, संवेदना और निस्वार्थ समर्पण का ऐसा बंधन है, जो जीवन को नई ऊर्जा, आशा और सकारात्मकता प्रदान करता है। सच्चा मित्र हमारे सुख-दुःख का सहभागी बनकर हमें सही मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है तथा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी संबल बनकर साथ खड़ा रहता है।
आज के बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ती व्यस्तताओं और डिजिटल युग में, जहाँ संवाद के अनेक माध्यम तो बढ़े हैं, किंतु आत्मीय संबंधों का दायरा कहीं-न-कहीं सीमित होता जा रहा है, ऐसे समय में मित्रता का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। परस्पर विश्वास, सम्मान, सहिष्णुता और सहयोग पर आधारित मित्रता ही एक संवेदनशील, समरस और समावेशी समाज की आधारशिला है।
आइए, इस अवसर पर हम अपने संबंधों को और अधिक स्नेह, विश्वास, संवेदनशीलता एवं सद्भाव से सुदृढ़ बनाने का संकल्प लें तथा अपने जीवन में ऐसे मित्र बनें, जो दूसरों के लिए प्रेरणा, सहयोग और सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकें।
सभी साथियों को मित्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं स्वस्थ, सुकूनदायक व समुन्नत जीवन की अनेकानेक शुभकामनाएँ।
Saturday, August 1, 2026
मुंशी प्रेमचंद: हिंदी वाङ्मय में मानवीय संवेदनाओं के अद्वितीय और अनमोल साहित्यकार
मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को सादर स्मरण व नमन स्वरूप:
मुंशी प्रेमचंद: हिंदी वाङ्मय में
मानवीय संवेदनाओं के अद्वितीय और अनमोल साहित्यकार
"सोने और खाने का नाम ज़िंदगी नहीं है। अन्याय में सहयोग देना, अन्याय करने के ही समान है और आत्मसम्मान की रक्षा हमारा सबसे पहला धर्म है।"
आज 31 जुलाई को हिंदी और उर्दू साहित्य के महान कथाकार, युगप्रवर्तक उपन्यासकार तथा संवेदनशील कहानीकार और हिंदी साहित्य में 'उपन्यास सम्राट' के रूप में प्रतिष्ठित मुंशी प्रेमचंद उर्फ़ धनपत राय (वास्तविक नाम) उर्फ़ 'नवाब राय' (प्रारंभ में इस नाम से लेखन) की 146 वीं जयंती पर उनकी स्मृति को सादर स्मरण व नमन।
हिंदी साहित्य के अद्वितीय रचनाकार, हिन्दी हृदय सम्राट तथा ग्रामीण जीवन के सफल चितेरे मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय समाज के यथार्थ, किसानों की पीड़ा, सामाजिक विषमता, स्त्री की स्थिति, जातिगत भेदभाव, शोषण तथा मानवीय मूल्यों को अत्यंत संवेदनशीलता और प्रामाणिकता के साथ चित्रित किया। उनकी रचनाओं में आदर्श और यथार्थ का संतुलित समन्वय दिखाई देता है, जो पाठकों को सामाजिक चेतना और नैतिक प्रेरणा प्रदान करता है। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'गोदान', 'गबन', 'निर्मला', 'सेवासदन', 'रंगभूमि' और 'कर्मभूमि' तथा 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'कफन', 'नमक का दरोगा', 'दो बैलों की कथा' और 'पंच परमेश्वर' जैसी कहानियाँ आज भी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
मानवीय संवेदनाओं के अमर साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने समाज के अंतिम व्यक्ति के दुःख, संघर्ष और शोषण को अपनी लेखनी का केंद्र बनाया। उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज के यथार्थ, ग्रामीण जीवन की पीड़ा, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं को अमर स्वर प्रदान किया है। आज जब समाज तीव्र आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, तब प्रेमचंद का साहित्य हमें संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, समानता, नैतिकता और मानवीय गरिमा का महत्व समझाता है। उनकी रचनाएँ ग्रामीण भारत की चुनौतियों, शिक्षा, स्त्री-सशक्तीकरण, सामाजिक समरसता तथा वंचित वर्गों के अधिकारों के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा देती हैं। वे यह संदेश भी देती हैं कि वास्तविक विकास तभी सार्थक है, जब उसमें मानवीय संवेदनाएँ, नैतिक मूल्य और सामाजिक उत्तरदायित्व समान रूप से समाहित हों। इसी कारण मुंशी प्रेमचंद का साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी सामाजिक चेतना और लोकमंगल का कालजयी मार्गदर्शक है।
मुंशी प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज़ और आज भी मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक न्याय का प्रेरणास्रोत है। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज-जागरण और परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया। साथ ही, न्याय, समानता तथा करुणा के मूल्यों को अपनी लेखनी के केंद्र में रखा। इसीलिए उनकी रचनाएँ समय की सीमाओं से परे जाकर प्रत्येक युग में समान रूप से प्रासंगिक बनी हुई हैं। उनकी जयंती हमें साहित्य की सामाजिक भूमिका और मानवीय मूल्यों के प्रति पुनः समर्पित होने की प्रेरणा देती है।
हिंदी वाङ्मय के अनमोल साहित्यकार, भारतीय ग्रामीण समाज के संवेदनशील कथाकार तथा मानवीय मूल्यों के सशक्त पैरोकार मुंशी प्रेमचंद की पुण्यस्मृति को पुनः सादर नमन।ऐसे महान साहित्य-मनीषी के अप्रतिम साहित्यिक योगदान, आदर्श व्यक्तित्व और अमूल्य विरासत के प्रति हम अपनी विनम्र श्रद्धांजलि एवं हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। उनकी लेखनी से प्रस्फुटित मानवीय चेतना, लोकमंगल की भावना और सामाजिक सरोकार आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
Wednesday, July 29, 2026
गुरू पूर्णिमा : ज्ञान, संस्कार और आत्मबोध का महापर्व
गुरू पूर्णिमा : ज्ञान, संस्कार और आत्मबोध
का महापर्व
गुरुर्ब्रह्मा
गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात्
परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
आषाढ़ पूर्णिमा का
पावन पर्व गुरू पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की उस अमर परंपरा का उत्सव है, जिसमें
गुरू को केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का
पथप्रदर्शक, संस्कारों का संवाहक और व्यक्तित्व का निर्माता
माना गया है। आज का यह पावन दिवस अपने प्रथम गुरू अपने माता-पिता और श्रद्धेय गुरूओं
के महान व्यक्तित्व और उनके योगदानों को स्मरण व नमन करने का है । यह दिन भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित
स्वरूप प्रदान करने वाले महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
भारतीय चिंतन परंपरा
में गुरू वह प्रकाश है,
जो अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर विवेक, सत्य
और आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित करता है। गुरू केवल पुस्तकीय ज्ञान का संचारक
नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्यबोध,
नैतिकता और राष्ट्रसेवा की भावना का भी संस्कार देते हैं। एक
श्रेष्ठ गुरू अपने शिष्य में केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि
चरित्र का निर्माण करता है और एक आदर्श शिष्य वह है जो विनम्रता, अनुशासन, जिज्ञासा तथा निरंतर सीखने की भावना को
अपने जीवन का आधार बनाता है।
आज जब भारत राष्ट्रीय
शिक्षा नीति-2020
के माध्यम से ज्ञान, कौशल, नवाचार, भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्यपरक शिक्षा के
समन्वय के साथ “विकसित भारत@2047” के निर्माण की दिशा में
अग्रसर है, तब गुरू-शिष्य परंपरा का महत्व और भी बढ़ जाता
है। हमारे शिक्षक नई पीढ़ी को केवल भविष्य के लिए तैयार नहीं कर रहे, बल्कि ऐसे उत्तरदायी नागरिक गढ़ रहे हैं जो मानवता, संवेदनशीलता,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत हों।
बदलते
गुरु-शिष्य संबंध : परंपरा से प्रगति की ओर -- गुरू पूर्णिमा भारतीय
संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो हमें गुरू -शिष्य परंपरा के शाश्वत
मूल्यों का स्मरण कराता है। लेकिन समय के साथ शिक्षा के स्वरूप, तकनीक और संसाधनों में व्यापक परिवर्तन आया है। आज डिजिटल माध्यमों,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और
वैश्विक ज्ञान-संसाधनों ने सीखने की संभावनाओं का विस्तार किया है। इन परिवर्तनों
के बीच गुरू की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जानकारी अनेक स्रोतों से
मिल सकती है, परंतु सही दिशा, विवेक,
मूल्यबोध और जीवन-दृष्टि केवल एक गुरू ही प्रदान कर सकता है। इसी प्रकार आज के शिष्य के लिए भी यह आवश्यक है
कि वह केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित न रहे, बल्कि
सीखने की निरंतर जिज्ञासा, गुरुओं के प्रति सम्मान और समाज
के प्रति उत्तरदायित्व को अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बनाए। गुरू और शिष्य का
संबंध अधिकार का नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद,
सम्मान और सतत सीखने की साझेदारी का संबंध है।
आइए, आज
हम सब यह संकल्प लें कि बदलते समय के साथ शिक्षा के साधन भले बदलें, पर गुरू-शिष्य परंपरा के मूल मूल्य - श्रद्धा,
ज्ञान, संस्कार, संवाद
और समर्पण - सदैव अक्षुण्ण रहें। इस पावन अवसर पर, मैं अपने
सभी गुरूजनों और शिक्षक साथियों के प्रति अपनी
हार्दिक श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। आपका समर्पण, तप और सेवा ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है। साथ ही, मैं सभी विद्यार्थियों से आग्रह करता हूँ कि वे अपने गुरूओं के प्रति
सम्मान, विश्वास और सीखने की जिज्ञासा आजीवन बनाए रखें। यही
गुरू-दक्षिणा का सर्वोत्तम स्वरूप है। यही गुरू-परंपरा के प्रति हमारी
सच्ची श्रद्धा होगी।
“ज्ञान, संस्कार और सेवा का यह प्रकाश हम सभी के जीवन
को निरंतर आलोकित करता रहे।“
पुनः सभी गुरूजनों एवं प्यारे विद्यार्थियों
को गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सादर/सप्रेम,
डॉ
शुभ
Tuesday, July 21, 2026
महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा : अध्यात्म, संस्कृति और समावेशी समाज की यात्रा का संगम
महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा : अध्यात्म, संस्कृति और समावेशी समाज की यात्रा का संगम
ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा सनातन धर्म के सबसे भव्य और पवित्र सांस्कृतिक उत्सवों में से एक है, जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आरंभ होती है। इस नौ दिवसीय महापर्व में महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान श्री बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने भव्य और विशाल लकड़ी के रथों में सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए अपनी मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) जाते हैं। यह भव्य और दिव्य रथ यात्रा महाप्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के प्रेम और उनके भक्तों के प्रति समर्पण का प्रतीक है| यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि मानव एकता और समानता का एक विशाल उत्सव है जिसमें सभी जाति और धर्म के लोग शामिल होते हैं|
इस दिव्य रथ
यात्रा की अपनी अनूठी और भव्य विशेषताएं हैं :-
रथों
के नाम: भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष', बलभद्र के रथ
को 'तालध्वज' और सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' कहा जाता है।
ये तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं और बेहद ऊंचे और आकर्षक होते हैं।
परंपराएं:
यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों के आगे का
रास्ता साफ करते हैं, जिसे 'छेरा पहँरा' कहा जाता है। इसके बाद ही लाखों श्रद्धालु मिलकर इन विशाल
रथों को खींचते हैं | पुरी के मुख्य
मंदिर से गुंडीचा मंदिर के बीच की यह दिव्य यात्रा लगभग 3 किलोमीटर की
होती है।
महाप्रभु
जगन्नाथ के रथ के सारथी 'दारुक' हैं और रथ पर लगा
ध्वज 'कपिलध्वज' कहलाता है। गुंडीचा मंदिर में बिताए गए इन 9 दिनों के दौरान
भगवान के दर्शन को ‘आड़प-दर्शन’ कहते
हैं और यहाँ मिलने वाला प्रसाद महाप्रसाद माना जाता है। यात्रा के नौवें दिन 'बहुड़ा यात्रा' (घर वापसी) होती है। वापसी के समय रथ मंदिर के सिंहद्वार के
पास रुकते हैं और 'सोना
बेशी' (स्वर्ण आभूषणों
का शृंगार) के दर्शन होते हैं।
यह पवित्र रथयात्रा महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के अपने भक्तों को दर्शन देने और गुंडीचा मंदिर जाने का उत्सव है। यह भव्य पर्व जाति और धर्म से परे सभी को ईश्वर के साक्षात दर्शन और उनके 'महाप्रसाद' का लाभ प्राप्त करने का अवसर देता है।
इस दिव्य रथ
यात्रा का अपना महत्व है:-
समानता
और प्रेम का प्रतीक: रथयात्रा ऐसा अवसर है जब भक्त बिना किसी भेदभाव के स्वयं
भगवान के रथ की रस्सियों (पवित्र रथ नंदीघोष,
तालध्वज और दर्पदलन) को खींच सकते हैं। इसे अहंकार और सांसारिक बंधनों को
तोड़ने का प्रतीक माना जाता है।
भक्ति
का विस्तार: यह यात्रा जगत के नाथ को उनके गर्भगृह से निकालकर आम जन की
सड़कों (बड़ा डंडा) पर लाती है,
जिससे वे पतित पावन के रूप में सभी प्राणियों को अपना आशीर्वाद देते हैं।
नौ दिवसीय यात्रा और मोक्ष: तीनों विग्रह गुंडीचा मंदिर में 9 दिन तक विश्राम करते हैं। मान्यता है कि इन नौ दिनों में रथ के दर्शन करने या यात्रा में शामिल होने मात्र से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
आज के इस पावन अवसर पर मेरी हार्दिक कामना है कि महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा का दिव्य आशीर्वाद आपके और आपके परिवार पर हमेशा बना रहे। यह पावन पर्व आपके जीवन में नई आशा, सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।
जय जगन्नाथ!"