महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा : अध्यात्म, संस्कृति और समावेशी समाज की यात्रा का संगम
ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी की पवित्र रथ यात्रा सनातन धर्म के सबसे भव्य और पवित्र सांस्कृतिक उत्सवों में से एक है, जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आरंभ होती है। इस नौ दिवसीय महापर्व में महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान श्री बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने भव्य और विशाल लकड़ी के रथों में सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए अपनी मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) जाते हैं। यह भव्य और दिव्य रथ यात्रा महाप्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के प्रेम और उनके भक्तों के प्रति समर्पण का प्रतीक है| यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि मानव एकता और समानता का एक विशाल उत्सव है जिसमें सभी जाति और धर्म के लोग शामिल होते हैं|
इस दिव्य रथ
यात्रा की अपनी अनूठी और भव्य विशेषताएं हैं :-
रथों
के नाम: भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष', बलभद्र के रथ
को 'तालध्वज' और सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' कहा जाता है।
ये तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं और बेहद ऊंचे और आकर्षक होते हैं।
परंपराएं:
यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों के आगे का
रास्ता साफ करते हैं, जिसे 'छेरा पहँरा' कहा जाता है। इसके बाद ही लाखों श्रद्धालु मिलकर इन विशाल
रथों को खींचते हैं | पुरी के मुख्य
मंदिर से गुंडीचा मंदिर के बीच की यह दिव्य यात्रा लगभग 3 किलोमीटर की
होती है।
महाप्रभु
जगन्नाथ के रथ के सारथी 'दारुक' हैं और रथ पर लगा
ध्वज 'कपिलध्वज' कहलाता है। गुंडीचा मंदिर में बिताए गए इन 9 दिनों के दौरान
भगवान के दर्शन को ‘आड़प-दर्शन’ कहते
हैं और यहाँ मिलने वाला प्रसाद महाप्रसाद माना जाता है। यात्रा के नौवें दिन 'बहुड़ा यात्रा' (घर वापसी) होती है। वापसी के समय रथ मंदिर के सिंहद्वार के
पास रुकते हैं और 'सोना
बेशी' (स्वर्ण आभूषणों
का शृंगार) के दर्शन होते हैं।
यह पवित्र रथयात्रा महाप्रभु श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के अपने भक्तों को दर्शन देने और गुंडीचा मंदिर जाने का उत्सव है। यह भव्य पर्व जाति और धर्म से परे सभी को ईश्वर के साक्षात दर्शन और उनके 'महाप्रसाद' का लाभ प्राप्त करने का अवसर देता है।
इस दिव्य रथ
यात्रा का अपना महत्व है:-
समानता
और प्रेम का प्रतीक: रथयात्रा ऐसा अवसर है जब भक्त बिना किसी भेदभाव के स्वयं
भगवान के रथ की रस्सियों (पवित्र रथ नंदीघोष,
तालध्वज और दर्पदलन) को खींच सकते हैं। इसे अहंकार और सांसारिक बंधनों को
तोड़ने का प्रतीक माना जाता है।
भक्ति
का विस्तार: यह यात्रा जगत के नाथ को उनके गर्भगृह से निकालकर आम जन की
सड़कों (बड़ा डंडा) पर लाती है,
जिससे वे पतित पावन के रूप में सभी प्राणियों को अपना आशीर्वाद देते हैं।
नौ दिवसीय यात्रा और मोक्ष: तीनों विग्रह गुंडीचा मंदिर में 9 दिन तक विश्राम करते हैं। मान्यता है कि इन नौ दिनों में रथ के दर्शन करने या यात्रा में शामिल होने मात्र से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
आज के इस पावन अवसर पर मेरी हार्दिक कामना है कि महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा का दिव्य आशीर्वाद आपके और आपके परिवार पर हमेशा बना रहे। यह पावन पर्व आपके जीवन में नई आशा, सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।
जय जगन्नाथ!"
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