एक पेड़ की नियति
देख रहे हो न विनोद पेड़ को! फलों और फूलों से
लदा इतरा रहा है, इतराए भी क्यों न! पेड़ के जीवन का सौंदर्य और
उन्नति भी तो इसी में निहित है। लेकिन उससे ज्यादा उसकी शाखों पर लगे फूल और फल
इतरा रहे हैं। अपने सौंदर्य और उपयोगिता के कारण उन्हें ऐसा लगता है कि पेड़ की
उपादेयता हमारी वजह से है लेकिन उन्हें कौन समझाए!खैर, उधर पेड़ भी इन फूलों और फलों को देखकर फूला
नहीं समा रहा। उसे लगता है कि उसका जीवन सफल और सार्थक हो गया।
लेकिन शायद पेड़ को अपनी नियति का भान नहीं था, समय के साथ फूल और फल दोनों ही उसे छोड़ चले।
पेड़ निराश हुआ लेकिन हताश नहीं। उसने पुनः अपनी प्राण-वायु से स्वयं को फूलों और
फलों से लकदक कर लिया लेकिन इसका हश्र भी वही हुआ, फल
और फूल पुनः उसे छोड़ चले। ऐसी प्रक्रिया उसके साथ कई सालों तक चली। अंततः उसकी
निराशा हताशा में बदलने लगी और वह टूटने लगा। इस टूटन की प्रक्रिया में फूलों और
फलों के बाद पत्ते भी जो पेड़ों की वजह से हरे थे, उन्हें
यह गुमान था कि इस पेड़ का जीवन तो मेरी वजह से है, वे
भी धीरे-धीरे छोड़ चले। अब पेड़ फल-फूल-पत्र विहीन खड़ा है। अपनों के द्वारा
जबरदस्ती वानप्रस्थ दे दिए जाने से यह पेड़ अंदर ही अंदर मरने लगा।
इस पेड़ को बीज से विशाल वृक्ष में बदलने वाले
अब धीरे-धीरे उसकी टहनियों को कतरने लगे। अब वृक्ष खड़ा तो है लेकिन बिल्कुल ठूँठ, उसमें प्राण है या नहीं, कह पाना मुश्किल है। एक दिन ऐसा होता है कि उस
पेड़ को अपने ही धराशायी कर देते हैं या वह जीवन भर थपेड़ों की मार सहता हुआ स्वयं
ही धराशायी हो जाता है। वैसे वह मर तो कब का चुका था।
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शुभ
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